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शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

ऊर्जा का अपूर्व भण्डार :

 अंकुरित अन्न आहार 

( दधिमति पत्रिका के पाठकों को कुछ उपयोगी सामग्री इसके "सेहत और खानपान" स्तंभ के माध्यम से प्रस्तुत की जाये,इस भाव से प्रेरित व अनुप्राणित होकर लिखा गया यह सर्वथा मौलिक लेख आप के लिए आपकी सेहत से जुड़े विषय पर प्रस्तुत है, इस आशा के साथ कि यह आपकी खान पान की आदतों में सकारात्मक एवं सार्थक बदलाव लाने में  सहायक सिद्ध होकर आप के स्वास्थ्य संरक्षण में सहायक सिद्ध होगा.लेख अपने विषय पर स्पष्ट एवं परिपूर्ण हो, के ध्येय एवं लक्ष्य के कारण कुछ लंबा अवश्य हो गया है. – बी.जी.शर्मा )



               
यदि  हम जीभ के स्वाद को अनदेखा कर सेहत को महत्व देते हैं तो अंकुरित अन्न का नाश्ता लाजबाब है व सेहतमंद गुणों का इतना बड़ा खजाना है कि हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते .वस्तुतः अंकुरित अन्न फलों का श्रेष्ठ विकल्प है एवं अंकुरित अन्न खाने वालों को सेहत के लिए फलाहार पर कम  निर्भर रहना पडता है. हम बाजार से लाकर ताजा फल एवं सब्जी भी खाते हैं ,तो उसका सम्बन्ध विच्छेद अपनी डाल अथवा अपनी जड़ से कुछ घंटे, कुछ दिन पूर्व हो चुका होता है, परिणामतः उसके जीवन एवं वृद्धि पर तो विराम लग ही चुका होता है बल्कि वह फल एवं सब्जी क्रमश ह्रास एवं मृत्यु की और अग्रसर हो रही होती है. यदि गर्मी का मौसम है एवं फलों सब्जियों के स्टाक के लिए रेफ्रिजरेशन की सुविधा नहीं है तो उस फल एवं सब्जी की जीवन शून्य होने की तरफ अग्रसर होने की  यह गति और भी ज्यादा हो जाती है. जबकि इसके विपरीत अंकुरित अन्न खाना बगीचे में पेड़ के नीचे खड़े होकर तुरंत  ताजा फल तोड़ कर खाने के समान है. इस का कारण भी स्पष्ट है कि अंकुरित अन्न हमारे दाँत के नीचे आने एवं पिसने तक जीवित इएवं सतत बढ़ता हुआ दाना होता है. जीवित, जीवंत एवं जीवनी शक्ति से युक्त इस आहार में  दुर्लभ विटामिन्स एवं एंजाइम्स होते हैं जो सिर्फ अन्न में अंकुरण के समय ही मौजूद होते हैं व  कहीं किसी औषधि एवं फल में नहीं होते.



अन्न अंकुरण के समय दाने में दुर्लभ विटामिन्स एवं एंजाइम्स क्यों होते हैं ?



इस  में प्रकृति की लीला या माया, यों समझी जा सकती है कि प्रकृति एक मृत एवं निष्क्रिय सूखे हुए बीज में अंकुरण के समय नव जीवन का संचार उस दाने की पुनः उत्पादन क्षमता सक्रिय करने की नीयत से,करती है एवं उस नवजीवन संचार के सीमित समय अवधि (जब दाना फटता है, और उसमे अंकुर प्रस्फुटित होता है एवं पौधे का आकार  ग्रहण करने से पूर्व ) के लिए प्रकृति उसको वरदान स्वरुप अपने श्रेष्ठतम निधियां अर्थात विटामिन्स एवं एंजाइम्स प्रदान करती है एवं इस के पीछे प्रकृति का उद्देश्य होता है उसे अर्थात दाने को अतिरिक्त जीवनी क्षमता प्रदान करना.

अंकुरित  अन्न किसी भी रूप में किसी भी सहयोगी एवं स्वादवर्धक आहार के साथ अपनी पाचन क्षमता के एवं अपने शरीर की प्रकृति के अनुकूल मर्यादित मात्रा में नियमित लिए जाएँ तो ना सिर्फ अभूतपूर्व ऊर्जा एवं उत्साह देते है वरन अल्पकाल में ही चेहरे पर एक अपूर्व ओज एवं कांति झलकने लगती है. अंकुरित अन्न शरीर की चयापचय प्रणाली को भी दुरुस्त करते हैं, परिणामतः दहन भट्टी अर्थात अग्न्याशय भी शर्करा को ठीक से जलाने का काम करती है एवं इस से मधुमेह नियंत्रण भी सहज हो जाता है. ये शरीर की सामान्य दुर्बलता दूर करता है एवं कोलेस्ट्रोल नियंत्रण करने के कारण ये रक्त चाप नियंत्रण करता है, परिणामतः ह्रदय रोग को भी नियंत्रित करने में सहायक है. वस्तुतः अंकुरित अन्न आहार के लाभ बताए नहीं जा सकते, इन्हें स्वयं लेकर ही महसूस किया जा सकता है. उत्साह एवं चुस्ती फुर्ती आपको दो चार दिन में एवं त्वचा एवं चहरे पर ओज एवं कांति एक डेढ़ महीने में महसूस होने लगेगी ! अंकुरित अन्न जीवनी शक्ति से भरपूर जीवित एवं जीवंत ऐसा अद्भुत आहार है कि बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करता है एवं युवा अवस्था का काल दीर्घ कर देता है. यह शरीर को डीटोक्सीफाई करने में मदद करता है क्यों कि अपनी क्षारीय प्रकृति के कारण हमारे शरीर के विजातीय द्रव्यों को निकाल बाहर करता है. अपनी क्षारीय प्रकृति के कारण शरीर के आंतों के अति अम्लोत्पादन (एसिडिटी) को तटस्थ एवं अप्रभावी कर देता है. अंकुरित अन्न फाईबर का अपूर्व भण्डार है, परिणामतः कब्ज पर नियंत्रण करके पाचन शक्ति को दुरुस्त करता है. यदि आप अंकुरित अन्न का नाश्ता लेते हैं तो आपको इतनी ऊर्जा अल्प मात्रा में अंकुरित अन्न खाने में मिलती है कि आप को ऊर्जा के लिए आहार की आवश्यकता महसूस नहीं होती व ना ही उदर ही आहार की मांग करता है, परिणामतः अनावश्यक आहार की मात्रा घटने से आप के लिए अपना वजन घटाना एवं नियंत्रण में रखना सहज हो जाता है.


अन्न अंकुरण कैसे करें ?




अन्न  अंकुरण का परंपरागत तरीका सहज एवं सरल है कि अन्न को पहले पर्याप्त समय तक भिगो दिया जाए एवं भीग जाने के बाद कपडे में बाँध कर पर्याप्त समय के लिए रखा जाये कि दाने में अंकुर फूट जाए. आजकल बाजार में डिब्बानुमा उपकरण (स्प्राउट मेकर) मिलते हैं, जो अन्न अंकुरण बेहतर तरीके से करते हैं. ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में दाने सहज ही अल्प समय में अंकुरित हो जाते हैं जब कि शरद  ऋतु में थोडा ज्यादा समय लगता है. स्प्राउट मेकर डिब्बे में अपेक्षा कृत सुगमता से अंकुरण होता है एवं दाने का अंकुरण तीव्र गति से होकर अधिकांशतः दाने अंकुरित हो जाते हैं. आप अंकुरित आहार की नियमितता के लिए अंकुरित किये दाने फ्रिज में रख सकते हैं, जो खराब नहीं होते हैं. ( कारण कि फ्रिज में भी उनकी वृद्धि प्रक्रिया जारी रहती है,बेशक ठन्डे वातावरण के कारण इसकी गति कम होती है ) जो आप खाने में काम में ले सकते हैं. ज्यादा समय फ्रिज फ्रिज में रखे या ताजा अंकुरित अन्न खाने को उपलब्ध हो तो फ्रिज में रखे अंकुरित अन्न को आप पका कर दाल एवं सब्जी के रूप में खाने में काम में ले सकते हैं.


कौन सा अन्न अंकुरण के लिए श्रेष्ठ है ?


इस  का कोई निश्चित सूत्र नहीं ! देश, काल, ऋतु, भौगोलिक परिस्थिति, अन्न का प्रचलन एवं उपलब्धता तथा सबसे बढ़कर प्रयोक्ता की रूचि के अनुसार प्रत्येक अन्न जो मानव के लिए खाद्यान्न की श्रेणी में आता हो ,को अंकुरण कर खाया जा सकता है. हमारे यहाँ की परिस्थिति में गेहूं को भी अंकुरित कर खाया जा सकता है एवं दाना मेथी भी (प्रायः कम गर्मी में अंकुरित होने वाले ), किन्तु ज्यादातर दलहन; यथा चना, मोठ, चौला, मूंग आदि का प्रचलन है. किन्तु अंकुरित आहार में ज्यादा प्रचलन मूंग का ही है. इस का कारण सहज उपलब्धता, इसका सुपाच्य प्रोटीन एवं निरापद आहार होना है. ( इस लेख में भी मूंग को केंद्र में रख कर ही हम अंकुरित आहार पर चर्चा करेंगे )

अंकुरित अन्न (मूंग) को कैसे खाया जाये ?




इस  का भी कोई निश्चित सूत्र नहीं है. मूल उद्देश्य है कि अंकुरित आहार हमारे उदर में पहुंचाना एवं इसके चलते चाहे स्वाद के लिए या इसके गुण अभिवृद्धि के लिए इसके साथ सहायक आहार लिया जा  सकता है,  बल्कि लिया ही जाता है. कुछ सुझाव यों है –


(१)   सर्वाधिक प्रचलित सहायक आहार अंकुरित मूंग के लिए गुड़ है, जिसके साथ अंकुरित मूंग को चबा चबा कर खाया जाता है. यह बच्चों युवकों एवं परिश्रम करने वालों के लिए श्रेष्ठ है क्यों कि यह अपनी इक्षु शर्करा के कारण तुरंत ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति करता है. इसमें गुड़ के अतिरिक्त या विकल्प के तौर पर भीगी हुई किशमिश भी प्रयुक्त की जा सकती है. यह शक्तिदायक तो है ही साथ ही साथ अंकुरित आहार को सुपाच्य बना देती है. संभवतः यह मीठा सहायक आहार मधुमेह के मरीज ना लेना चाहें, यदि लेवें तो भी अपने चिकित्सक की सलाह से लेवें.


(२)   अंकुरित मूंग के साथ मक्खन अथवा घी एवं पीसी मिश्री मिला कर ली जा सकती है. यह युवकों बच्चों एवं परिश्रम करने वालों के लिए श्रेष्ठ है इस से रुक्ष आँतों को स्नेह भी मिलता है. यदि मिश्री मधुमेह अथवा अन्य कारण से अनुकूल  ना हो तो इस की जगह मक्खन एवं नमक लिया जा सकता है.


(३)   अंकुरित मूंग के साथ दही एवं पीसी हुयी  मिश्री/ शक्कर ली जा सकती है . दही अपने में अवस्थित मानव मित्र जीवाणुओं ( लेक्टो बेसिली बेक्टेरिया) के कारण मूंग के प्रोटीन को पचाने हेतु  श्रेष्ठ पाचक का काम करता है. इसको ज्यादा पौष्टिक एवं ऊर्जादायी बनाने के लिए इस में अर्थात दही में  घी / मक्खन मिलाया जा सकता है . एक विकल्प शहद भी है जो ना सिर्फ ऊर्जा प्रदाता है बल्कि अंकुरित अन्न एवं दही के साथ मिल कर इनके  गुणों को द्विगुणित कर देता है एवं दही के साथ इसका संयोग श्रेष्ठ सौंदर्य वर्धक आहार भी है.


(४)   अंकुरित मूंग को सलाद कचूमर के साथ भी रूचिकर बना कर लिया जा सकता है. रूचि के अनुकूल प्याज. टमाटर के बारीक कतरन एवं थोडा सा  नीम्बू का रस एवं नमक,लाल / काली मिर्च पावडर मिला कर लेने से चटपटा किन्तु स्वस्थ्यप्रद आहार पसंद करने वालों के लिए श्रेष्ठ विकल्प है.


(५)   अंकुरित मूंग को फ्रूट चाट (मिक्स फ्रूट कचूमर नमक काली मिर्च के साथ ) लिया जा सकता है. चूँकि अंकुरित मूंग एक प्रोटीन आहार है अतः यह भी बेहतर हो सकता है कि इस को प्रोटीन पाचक फल विशेष के साथ लिया जाये. प्रोटीन को पचाने में सक्षम फल है पपीता. पपेन एक ऐसा रसायन है जो कि सिर्फ पपीते में ही उपलब्ध है एवं इस रसायन को प्रोटीन पाचक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है. पपीते को विटामिन ए के श्रेष्ठ स्त्रोत के रूप में जाना जाता है. ध्यान देने योग्य बात यह हैं कि मूंग उबाल कर दाल/ खिचड़ी  के रूप में खाने से सुपाच्य होती है किन्तु कच्चा खाने के लाभ अलग ही है. अंकुरित मूंग अंकुरण के कारण सुपाच्य हो जाता है किन्तु कच्चा आहार तो कच्चा ही होता है. अतः इसके सहायक आहार इसे पचाने में मदद करते हैं.





एक अभ्यास आपके जीवन का कायाकल्प कर सकता है कि आप पका कर खाया जाने वाला अन्न यथा मूंग दाल, मूंग खिचड़ी,चना, चौला,मेथी दाना, आदि सूखे दाने की बजाय इन्हें अंकुरित कर पका कर खाएं. यहाँ तक कि गेहूं के दलिये की जगह अंकुरित गेहूं को नमकीन खिचड़ी के रूप में पका कर अथवा उबले अंकुरित दाने घी शक्कर अथवा दूध शक्कर मिला कर खाने से इनके पोषण मूल्यों में कई गुणा वृद्धि कर देता है. ज़रा सोचिये ! क्या सूखे अन्न की जगह भीगा और अंकुरित अन्न पकाया हुआ, कोई नुकसान पहुंचा सकता है, सिवाय इसके कि तैयारी में यह आप से थोड़ा परिश्रम और समय ज्यादा मांगता है.
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संक्षेप एवं सार रूप में आप अंकुरित मूंग किसी भी सहायक आहार के साथ अपनी रुचि अनुकूल लें या बदल बदल कर रुचि बनाये रखने के लिए लेवें, पर इतना अवश्य ध्यान रखें कि आँत की सुविधा के लिए थोड़ा दांत से ज्यादा परिश्रम करावें. चबा चबा कर खाया कच्चा अंकुरित अन्न आप को ज्यादा लाभ देगा.  एक सावधानी अवश्य रखें कि खाने के लिए प्लेट में सजाने से पूर्व ऐसे दाने जो भीगे तो है किन्तु उनमे अंकुरण शुरू नहीं हुआ है, सावधानी पूर्वक अलग छांट दें . अंकुरण शुरू ना हुआ दाना, हो सकता हैं सडने की प्रक्रिया से गुजर रहा हो एवं फ़ूड पायजनिंग का कारण बन सकता है, क्यों कि वह दाना लंबे समय से भीगा  हुआ पड़ा है. अंकुरण शुरू हो चुका दाना याने जो दाना फट चुका एवं उसके शीर्ष पर नन्हा अंकुर नजर आ रहा हो, वह कच्चा खाने के लिए निरापद है.  अंकुरित अन्न जो आपने आहार के लिए छांट कर रखे हैं, को प्लेट में सजाने से पूर्व आप एक बार साफ़ ताजे पानी में डुबो कर धो अवश्य लें.
सार यह है कि अंकुरित अन्न सेहत का खजाना है. आप की सेहत को चाकचौबंद रख कर आप के शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता बढाता है एवं डाक्टर एवं अस्पताल के आप के फेरे कम करता है. किन्तु जरूरी है कि रसना पर आपका नियंत्रण हो एवं दृढता पूर्वक आप अंकुरित अन्न जैसे सात्विक आहार को अपनावें. आप दिन भर इधर उधर नाते रिश्तेदारों के यहाँ एवं व्यावसायिक मुलाकातों यात्राओं,यार दोस्तों एवं सहकर्मियों के साथ गपशप  के दौरान चटपटे मसाले दार एवं तले हुए, स्वास्थ्य के दुश्मन आहार से संभवतः ना बच पायें किन्तु एक नेक काम आप की अपनी सेहत के लिए कर सकते है, और वह है सुबह की शुरुआत अंकुरित अन्न का सात्विक एवं स्वास्थ्यप्रद नाश्ता करके करें. बाकी तो मर्जी है  आपकी क्योंकि आखिर पेट है आपका और सेहत भी है आपकी.


शुक्रवार, 9 मार्च 2012

दधिमती ( मार्च २०१२ )

दधिमती ( मार्च २०१२ )


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शनिवार, 3 मार्च 2012

देने का सुख


देने का सुख


[आलेख मूलतः दधिमती पत्रिका के सम्पादकीय के लिए लिखा गया और तदनुसार प्रकाशित भी हुआ ! कालांतर में निरंतर चिंतन से विषय विकसित विस्तारित व ज्यादा स्पष्ट होकर वर्तमान स्वरुप में आप के समक्ष है व इस में विषय से सम्बद्ध अन्य पहलुओं को शामिल किया गया है, जो सम्पादकीय में कई सीमाओं के चलते छूट गए थे! कहना ना होगा कि लेख गंभीर पाठकों के लिए है!]




यह विश्व  वस्तुतः देने की उज्जवल  एवं गौरवशाली परम्परा पर टिका हुआ है ! सूर्य हमें गुनगुनी और जीवनदायनी शुभ्र धूप देता है तो चन्द्रमा हमें शीतल चांदनी ! वसुधा बिना किसी अपेक्षा के अपनी छाती चीर कर हमारी उदरपूर्ति के लिए अन्न और अपने गर्भ से बहु उपयोगी अनमोल खनिज देती है, तो एक पैर पर हठ योगी की भांति खड़े वृक्ष हमें हमारा जीवन सुखद और आराम दायक बनाने के लिए उदार भाव से अपनी अर्जित निधियां हमें लुटा देतें हैं ! देने का भाव उदात्त और उदार मानसिकता का प्रथम लक्षण है !  (यदि देने के नाम पर किसी को दुःख देने का भाव ना हो तो )                           


देने वाला लेने वाले की तुलना में न सिर्फ दुनियादारी में एवं पारंपरिक रूप से बड़ा माना जाता है बल्कि  अपेक्षाकृत ऊंचे एवं ठोस नैतिक धरातल पर खडा दिखता है !लेने का भाव मन में आते ही नैतिक पतन का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होने लगता है ! इसके परिणाम के रूप में आत्मबल एवं पुरुषार्थ भाव दोनों का ह्रास होने लगता है ! लेने के भाव वालों अर्थात याचकों को कभी शिखर छूते नहीं देखा गया और मुक्त हस्त देने वालों को कभी अभावग्रस्त और दयनीय स्थिति में नहीं देखा गया ! कूप (कुआ) उदार भाव से अपनी अर्जित व संचित निधि (जल )का विसर्जन करने से  कंगाल नहीं होता,प्रकृति स्वतः ही विसर्जन के अनुपात में पुनः जल अर्जन की व्यवस्था कर देती है ! इसके विपरीत  यदि कूप जल विसर्जन न करे तो इस से कूप की जल समृद्धि का स्तर कभी बढ़ता नहीं है,  हाँ दीर्घ काल में कूप के जल का विसर्जन न किया जाए तो उसका जल सड़ कर अपेय अवश्य हो जाता है ! अपने जीवन में कई बार मिला कर अपने वजन के बराबर रक्तदान करने वाले को कभी रक्ताल्पता  का शिकार होते नहीं देखा गया ! वजह,   उदार प्रकृति उसकी रक्त की हुयी क्षति को अल्प समय में ही पूर्ति कर देती है ! बल्कि देने अर्थात दानशीलता के उदात्त एवं उदार भाव का  अपूर्व  गरिमामय तेज उसके चहरे पर अवश्य देखा जा सकता है ! इसके विपरीत अपने जीवन में कभी भी रक्तदान न करने वाले को कभी असाधारण स्वास्थ्य का धनी नहीं देखा गया ! इसका अर्थ यह हुआ कि  ईश्वर या प्रकृति  भी  अपनी निधियां  हमारी हथेली पर आशीर्वाद स्वरुप रखना चाहती  है किन्तु उसके लिए उचित अवसर एवं समय की प्रतीक्षा करती है ! और ऐसा करने के लिए सही  वक्त होता है जब हथेली किसी को देने के लिए खुली हो उसी  हथेली को  ठीक उसी समय कृपानिधान भी अपना प्रसाद जो कि किसी को देने के लिए खुली हुयी हथेली पर रख देते है  ! अपनी मुट्ठी भींच कर रखने वाले कृपण की हथेली पर दया सागर  ईश्वर कुछ रखना चाहे तो भी किधर से रखे ? हथेली खुली है पर याचक की, तो इस  खुली हथेली पर रखना तो प्रभु इसलिए उचित नहीं समझते की इस से  पुरुषार्थ की मान मर्यादा घटती है ! तब ही तो यह कहावत मशहूर है- "  ईश्वर भी उन पुरुषार्थियों की ही मदद करते है जो अपनी मदद खुद करने को तत्पर एवं प्रवृत होते हैं ! "


देने के भाव वाले की सोच बड़ी होती है तो उसके उद्यम,प्रयास व पुरुषार्थ भी बड़े होते है और तदनुसार परिणाम भी बड़े प्राप्त होते है ! लेने के भाव वाले अर्थात  याचक का ( या देने का उदार भाव ना रखने वाले के ) सरोकार सिर्फ स्वयं अर्थात स्व तक ही केन्द्रित होते है उसे अपने या गिने चुने निकट के स्व जनों की उदर पूर्ति की ही चिंता  रहती है, परिणामतः वह  (अति लालची प्रवृति वाले को अपवाद स्वरुप माने) छोटे लक्ष्य, अपनी उदर पूर्ति को लेकर लघु परिणामपरक प्रयास ही करेगा ! जबकि उदार व देने के भाव वाले तत्पर दानी को स्व के दायरे से बाहर निकल कर परहित के लिए चिंतन व प्रयास करना पड़ता है, जो स्वाभाविक रूप से बड़ा ही होगा, और वृहत परिणाम परक ही होगा !



देने का भाव,विचार या संकल्प मन में करते ही व्यक्ति के ह्रदय में व मनो मष्तिष्क में एक रासायनिक परिवर्तन होता है,जो भले ही अल्प समय के लिए ही हो,पर भीतर के  नकारात्मक मनोभावों को  प्रतिस्थापित कर उसके स्थान पर सकारात्मक  व आनंद दायी मनोभावों के समुच्चय से परिपूरित कर देता है ! जैसे स्नानघर में लोटे से स्नान करने वाला जलाशय में तैरने, एवं  प्रसव पीड़ा झेल कर  प्राप्त किये गए मातृत्व के सुख से  बाँझ स्त्री अनजानी और वंचित होती है,ठीक वैसे ही लेने की कामना वाला याचक और उसका ही सहोदर दान क़ी बजाय प्राण देना उचित समझने वाला कृपण (याचक और कृपण में भला अंतर ही कितना है ?) दोनों देने के अद्भुत सुख और दिव्य आनंद से वंचित होते हैं ! निस्संदेह ये समृद्धि एवं सम्पन्नता के पर्वत शिखर पर ही क्यों ना बैठे हो, पर दानशील व्यक्ति से कैसे भी श्रेष्ठ नहीं हो सकते ! इन के घर आँगन में लोट पोट होकर सम्पूर्ण सुवर्ण मय शरीर क़ी कामना रखने वाला नेवला संभवतः अपना जो वर्तमान  आधा सुवर्णमय शरीर है, को भी खो सकता है ! हाँ, एक अर्थ में याचक उदार दान शील व्यक्ति से बाजी मार लेता है, जब वह यह कहता है कि आखिर हम  याचक है तो ही उदार व दानी का अस्तित्व और महत्त्व है ! हालाँकि यह विनोदपूर्ण परिकल्पना मात्र ही है पर सोचिये अगर कोई याचक ही नहीं होगा तो काहे के दानी और दानवीर ?

दान का उद्देश्य दान दाता के लिए पुण्य कमाना या देने का सुख लूटना हो सकता है किन्तु इस के एक अन्य पहलू को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि दान का उद्देश्य  अकर्मन्य   एवं नाकारा लोगों की फ़ौज खडी  करना न हो  ! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सक्षम को दान देना उसके पुरुषार्थ भाव को कम करने का कारण हो सकता है ! किसी को एक दम नाकारा एवं निठल्ला बनाना हो तो उसकी हथेली पर बिना मांगे अनवरत कुछ ना कुछ रखते रहें,धीरे धीरे उसके भीतर का पुरुषार्थ भाव समाप्त होकर उसका स्थान  दैन्य भाव ले लेगा ! आप देखेंगे कि एक अच्छा भला श्रमजीवी अब एक परजीवी या याचक वृति पर निर्भर रहने वाला जीव बन गया है! जैसे जंग लोहे को एवं दीमक लकड़ी को धीरे धीरे खा जाते है वैसे ही दान मिलने की प्रत्याशा एवं इस पर निर्भरता धीरे धीरे व्यक्ति के भीतर याचक वृति विकसित करके उसके स्वाभिमान एवं पुरुषार्थ भाव को खा जाती है! उसके चिंतन के दायरे में अपनी जीविकोपार्जन हेतु विकल्प अब श्रम एवं पुरुषार्थ नहीं या अल्प मात्रा में है व याचना ही निर्भर रहने योग्य एक मात्र विकल्प बच रहा है! ऐसा कई बार देखा गया है कि ऐसे परजीवी व सबल सक्षम व्यक्ति (याचक) भी बिना प्रयास व उद्यम के वृति मिलने की आशा में दान दाता के द्वार पर याचकों की पंक्ति  में खड़े दिखते है व इसको अर्थात याचकों की पंक्ति में खड़े होने को अपना पूर्ण कालिक व्यवसाय मानते है ! उनका स्व विकसित सूचना तंत्र भी सदैव  टोह लेता रहता है तो इस बात की ही  कि सदाव्रत कहाँ बंट रहा है, न कि इस बात की कि मुझे जीविकोपार्जन हेतु काम  कहाँ मिल सकता है ! पुरुषार्थ, आत्म निर्भरता एवं स्वाभिमान तीनो अन्योन्याश्रित मनोभाव है व तीनों एक साथ ही रहते है! जिस व्यक्ति के यहाँ से एक का निष्क्रमण हुआ तो बाकी स्वतः ही वहां से निकल पड़ते है! अब उस व्यक्ति के पास दीनता, पर निर्भरता, मिथ्याभिमान याचना वृति आदि के लिए निरापद आवास है! व्यक्ति हो या संस्था, समाज एवं राष्ट्र सभी के लिए यही सर्व मान्य सिद्धांत लागू होता है! सरकारी योजना नरेगा इस बात को पुष्ट करने के लिए सटीक उदाहरण है कि सरकारी दान मिलने  की आशा में परिश्रम करके तीन गुना कमा सकने में सक्षम व्यक्ति भी अल्प परिश्रम से या बिना परिश्रम किये मिलने वाली वृति के लिए अपनी क्षमता के साथ अन्याय करता है !


दान तब ही सार्थक है जब सुपात्र को दिया जाए ! अपात्र को दिया दान दोहरा नुकसान  करता है ! प्रथमतः  समाज के सक्षम व उत्पादक व्यक्ति को नाकारा बनाता है दूसरे एक वास्तविक जरूरत मंद जो मदद या दान का वास्तविक हकदार है, के अवसर को अवरुद्ध करता है ! मेरा व्यक्तिगत मत तो यह है कि एक पुरुषार्थी व्यक्ति आजीवन परिश्रम कर के अपनी संतान एवं परिजनों के लिए पर्याप्त  संसाधन छोड़ कर मरता है तो वह भी एक तरह का दान ही है और वह भी अभिशाप हो सकता है, यदि उसके वारिसों को इस से बजाय  पुरुषार्थ के ,पिता  द्वारा अर्जित धन  से मौज करने की ही प्रेरणा मिले ! यह  कहावत इस बात के सन्दर्भ में बहुत प्रासंगिक व समाचीन जान पड़ती है कि - "पूत कपूत तो क्यूँ धन संचै,पूत सपूत तो क्यों धन संचै "!  साहसी व समझदार पिता होगा तो अपनी भावी पीढी के लिए अकर्मण्यता का मार्ग प्रशस्त करने वाली  विपुल सम्पति छोड़ने की अपेक्षा उनमे संघर्ष करने व उसकी आंच सहने की क्षमता, पुरुषार्थ का स्वभाव  अपने आप को मजबूती से खड़े करने व रखने की योग्यता को विकसित करके छोड़ना ज्यादा श्रेष्ठ समझेगा ! जिस बाप ने अपनी अगली पीढी को तपा कर कर्मठ,पुरुषार्थी और स्वाभिमानी नहीं बनाया और अगली पीढी बैठी खा सके इतना धनार्जन कर के संचित छोड़ दिया उस की आगामी पीढी का क्या हुआ इसके कई उदाहरणनजर पसार कर देखने से   मिल जायेंगे !



यह तथ्य भी  निरपेक्ष सत्य नहीं है क़ि याचक सदैव  दानी से निकृष्ट ही होते हैं !परोपकार के लिए लेने क़ी कामना करने वाला याचक श्रेष्ठ, आदरणीय व पूजनीय होता है ! परोपकार के लिए याचना करने वाला एवं झोली फैलाने वाला मेरी दृष्टि में तो दाता से कहीं बढ़ कर आदरणीय है क्यों कि वह लोक या पर हित से अनुप्राणित होकर अपने स्वाभिमान को एवं एवं याचना जन्य हो सकने वाले अपमान की संभावना को दरकिनार कर याचना करने का साहस जुटाता है ! सागर अथाह जल राशी का स्वामी है किन्तु खारे और अनुपयोगी जल का ! ये परोपकारी मेघ ही है जो इन से याचक बन कर खारा जल लेकर लोकहितार्थ सारा का सारा जल मीठा बना कर पुनर्वितरण कर देते हैं ! यदि कोई परोपकार एवं लोकहित से अनुप्राणित  याचक दाता के  पास आये वह पूजनीय,  सादर स्वागत  व आभार के योग्य है ! इतिहास ऐसे अनेकानेक उदाहरणों से भरा पडा है कि किसी महान आत्मा ने लोक हितार्थ अपने अभिमान को तज कर झोली उठायी और लोक हित के लिए अमूल्य एवं उपयोगी निधियों का सृजन कर डाला ! ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं, महामना मदनमोहन मालवीय इस तथ्य के जीवंत उदाहरण है कि उन्होंने लोकहित से अनुप्राणित होकर झोली उठायी और काशी हिन्दू विश्व विद्यालय जैसी भव्य शिक्षण संस्था खड़ी कर दी !  यह एक कड़वा सच है कि सामान्यतः व्यक्ति  भोग विलास वं कुटैव पोषण  के लिए ऋण ले लेता है किन्तु समृद्ध एवं सक्षम होने के बावजूद परोपकार के लिए आगे बढ़ कर स्वैच्छा से दान नहीं देता ! यहाँ परोपकार के लिए याचना करने वाला व्यक्ति प्रेरक कारक की भूमिका अदा करता है ! ऐसा करके  वह दाता को उसके धन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग, दान  का अवसर जो उपलब्ध करवाता है, जो कि धन की ज्यादा संभावित गति भोग एवं नाश से श्रेष्ठ है !

जब प्रसंग उदारता पूर्वक देने वालों अर्थात दानी महापुरुषों का  हो, तो स्वतः ही चर्चा के केंद्र में राजा बलि,राजा कर्ण,राजा शिवि जैसे महापुरुष  आ जाते है !  इन की दानशीलता के पीछे कारण निजी  संकल्पबद्धता, निजी वैचारिक आग्रह या प्रण हो सकता है ! क्षीण सी संभावना इन में यश की कामना एवं दानी के रूप में अमर कीर्ति अर्जित करना भी हो सकती है ! किन्तु पौराणिक इतिहास में एक ऋषि  का  उदाहरण विरला ही है क्यों कि उनके दान  में ऐसा कोई भाव या कामना दृष्टिगोचर या प्रतीत नहीं होती,  या यों कहें कि यह त्याग का उदाहरण  उदारता एवं दान शीलता की पराकाष्ठा एवं चरम है इन महर्षि दधीचि  का दान, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी  ! इन  का दान इसलिए सर्वाधिक उदार एवं एवं उदात्त है क्यों कि इस के पीछे ज़रा भी यश की कामना नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से लोक कल्याण एवं लोक रक्षा का भाव है ! इस मत को हमें मानना पडेगा कि विश्व में यश और कीर्ति ने उन्ही लोगों का तत्परता पूर्वक वरण किया है जिन्होंने बिना अपना नैतिक धरातल छोड़े यश और कीर्ति की उपेक्षा और अनदेखी की है ! दान,देने का उदार भाव एवं  देने के सुख को केंद्र में रख कर कर लिखे इस आलेख में  ऐसे महान ऋषि दधीचि को मेरा सादर नमन ! 

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

दधिमती (जनवरी २०१२ )




दधिमती  (जनवरी २०१२ )



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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

कविता का जन्म !



[ सहज नहीं है काव्य सृजन,सहज है तो आलोचना ! काव्य सृजन की क्या परिस्थिति होती है, क्या कवि की मनस्थिति होती है व कैसे होता है काव्य सृजन, से आप सुधि पाठकों को रू-ब-रू कराने को प्रस्तुत है यह कविता - बी  जी शर्मा ]

कविता का जन्म


मन मे भरी हो विरह वेदना, या प्रिय से मिलने का उल्लास !
घोर निराशा का अन्धियारा, या आशा उत्साह का हो प्रकाश !!


अन्तस् मे उबल रहा आक्रोश, या पीड़ा से  भीगा  हो   मन !
कल्पना का अम्बार लगा हो, छोटा पड़ रहा मन का आँगन  !


ज्वालामुखी फट  पडने को हो , मन मे भट्टी  भावों  की तपती है !
कवि की कलम से फूटे  झरना, तब कही एक गजल बनती है !!


शब्दों का नहीं भीड़ भड़क्का, सार्थक शब्दों की पांत सजा दी !
भाषा है रथ  विषय है दूल्हा, और भावों की  बारात  सजा दी !!


काव्य रसों की मेहंदी रचा कर, कविता  दुल्हन  बन  बैठी  है !
उपमा के गहनों से सजधज पाठक  के   मन  में   पैठी  है !!


कल्पनाओं के इन्द्रधनुष पर, विचारों की प्रत्यन्चा  तनती  है  !
सुधि  श्रोताओं का मन हरने, तब कविता या गजल बनती है !!


भूख प्यास नहीं नींद उचट गयी, न जाने क्यूँ मन है व्याकुल !
अजन्मी कविता बदले करवट, इसीलिए कविवर है आकुल !!


भाव स्निग्ध पर शब्द न मिले, मिले शब्द तो विषय अस्पष्ट !
अपूर्ण कविता कैसे पूर्ण  हो, कविवर का बस एक ही कष्ट !!


कोख  कमल में नौ महीने रख, जैसे माँ बच्चा जनती है !
कवि  जब भुगते प्रसव वेदना, तब कहीं एक गजल बनती है





मंगलवार, 3 जनवरी 2012

आओ पतंग उड़ाओ


[
 दधिमती मासिक पत्रिका के स्तम्भ  "बाल फुलवारी"  के लिए मकर संक्रांति  के अवसर पर बाल मनो विज्ञान को ध्यान में रख कर लिखी गयी कवितायें ! चूँकि यह सृजन बच्चों के लिए है अतः बाल सुलभ मनोरंजन ही इन में देखें न कि बौद्धिकता ! हालांकि कवितायें शिक्षा प्रद व  संदेशपरक है !]

आओ पतंग उड़ाओ


आओ   आओ  पतंग  उडाओ
चुन्नू   आओ    मुन्नू   आओ
डोर  समेटो   चरखी   पकड़ो
बात सुनो  तुम यों  ना झगड़ो

पतंग   सिखाये   अच्छी  बात
अनुकूल   ना     हो      हालात
सहज  ही  न  डालो    हथियार
संघर्ष   को  तुम दो   नयी धार

हवा  विरोधी , ये    न  घबराती
प्रतिरोध  से   ये   शक्ति   पाती
विरोध  को  अवलम्ब  बनाकर
आसमान    को  यह  छू   जाती

डोर    है    मर्यादा   का    बंधन
बंधी   है   तब तक  ही पतंग  है
कटी   डोर    से   हुयी  निरर्थक
कटी पतंग  के  न  कोई  संग है


मम्मी पतंग दिलाओ


देखो हर छत पर  लोग जमा
चिल्लाये  लगा कर पूरा जोर
ये   काटा   और   ये      मारा
का मचा रहे हैं मिल कर शोर


मम्मी अब तुम मुझे दिला दो
मैं    भी   पतंग      उड़ा उंगा
ऊंचे   आसमान  ले  जा   कर
मैं     भी    पेंच       लड़ा उंगा


भैया  ज़रा   ये चरखी  पकड़ो
बात बात पर   यों ना अकडो
दीदी  लो  तुम    डोर   समेटो
मुह  ना फुलावो  यों  ना  एंठो

आओ मिल कर पतंग उड़ायें
आसमान  पर  हम छा जाएँ
मेल जोल  से दुनिया चलती
ये   समझें  सबको  समझाएं


अपनी  नहीं  मैं  कटने  दूंगा
औरों   की   मैं    दूंगा    काट
जो    लूटूँगा    डोर     पतंगें
सब  बच्चों  में   दुंगा     बाँट


फीनी


घेवर   की   पक्की  है   सहेली
मानो  बुनी   हो   रेशेदार पहेली
बुढ़िया   के  बालों  का   गुच्छा
या   सूती   धागों    का  लच्छा

खुशबु   देती  है   भीनी   भीनी
संग   मिली  जब  इसके चीनी
सबको  भाये  सबको ललचाये
संक्रांती   का  पकवान है फीनी


घेवर


प्रभु  हम  को  दो  यह मीठा   वर
खाने    को    मिल    जाए   घेवर
हो   रबड़ी    वाला    या  हो  सादा
पूरा   ना    हो    भले   हो    आधा

इस    व्यंजन     के  है   कई   भेद
रंग   बिरंगे   तो   कुछ   है  सफ़ेद
पर   देखो सबका  है  एक भूगोल
सब  का  चेहरा  है  चाँद  सा गोल



गुलगुला


मीठा   मीठा   फूला    फूला
मानो  हो  काला  रसगुल्ला
पानी  ये  मुह  में  ले  आता
घर में है यह सब को भाता

बिना  फूंक  मार  जो  खाए
उसकी  तो  ये जीभ जलाए
गुड है  इसका घटक प्रधान
सक्रांति का मुख्य पकवान

छोटों  की  संगत  न सहता
संग  बड़ों  के  हरदम रहता
बच्चे  जो  ये  कविता पढेंगे
पढ़कर  इसका स्वाद चखेंगे


लड्डू तिल के


घेवर   और  फीनी  की  जोड़ी
संग  रहे  दोनों  हिल मिल के
पर  व्यंजन  में  बेमिसाल  है
ताकत   देते   लड्डू   तिल के

चबा  चबा  के   खाओ  लड्डू
ये     ऊर्जा     देते     भरपूर
गजक  रेवड़ी  व तिल पट्टी
सर्दी    भगाये   कोसों     दूर

हल्ला  गुल्ला    खेल   कूद  व
पतंग उडाओ तुम सब मिल के
और   मिठाई     यदा  कदा लो
रोज   खाइए    लड्डू  तिल के
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