© बी.जी.शर्मा; इस ब्लॉग पर उपलब्ध सामग्री प्रकाशित हो चुकी है, सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित है| बिना लिखित अनुमति इस ब्लॉग की सामग्री का कहीं भी और किसी भी प्रारूप में प्रयोग करना वर्जित है।

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

रावण दशानन नहीं एकानन था !

-तरुण कुमार दाधीच

( धरती चपटी है, यह स्थापित मान्यता थी। किन्तु नव खोज एवं अनुसन्धान ने सिद्ध किया कि धरती गोल है। ठीक वैसे ही स्थापित मान्यता है कि रावण के दस सिर थे। किन्तु दधिमती लेखक परिवार से हाल ही में जुड़े विद्वान लेखक श्री तरुण कुमार दाधीच का यह अनुसंधानपरक लेख इस विषय पर आपको निश्चित ही नवदृष्टि देगा संपादक )


          
हमारी संस्कृति में त्यौहारमाला में मोतियों की भांति पिरोये हुए हैं । प्रत्येक त्यौहार अपना सामाजिकधार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व रखता है । विजय दशमी का त्यौहार सांस्कृतिक दृष्टि से भगवान राम की असत्य पर सत्य कीअधर्म पर धर्म की विजय के फलस्वरुप हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । रावण बुरे कार्यों काकुम्भकरण आलस्य का औेर मेघनाद कटु वचनों के प्रतीक के रूप में इनके पुतले प्रतिवर्ष जलाए जाते हैं, ताकि हम बुराइयों को त्यागकर अच्छाइयों की ओर प्रेरित हों ।
         रावण के बारे में यह प्रश्न उठता है कि उसके दस सिर थे अथवा नहीं ? महर्षि वाल्मीकि एवं तुलसी के अनुसार रावण दस सिर वाला अर्थात् दशानन नहीं था । वस्तुतः रावण के पुतले में दर्शाए गए दस सिरों में पाँच पुरुष और पाँच स्त्री के विकारों को प्रकट करते हैं । उसके पुतले पर लगा गधे का सिर यह प्रकट करता है कि वह मतिहीन एवं हठी था । यह भी सर्वविदित है कि रावण ज्ञानी और महापंडित था । क्योंकि पुतले में रावण के हाथों में अस्त्र-शस्त्र के साथ वेद और शास्त्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं । रावण में अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण था, परन्तु वह अपने अदम्य अभिमान के कारण मारा गया । वाल्मीकि ने अपनी रामायण में स्पष्ट उल्लेख किया है कि जब हनुमानसीता का पता लगाने लंका गए थे तब उन्होंने रावण को एक सिर वाला देखा । रावण के दस सिर थे अथवा नहीं ? इस सम्बन्ध में अनेक मत है । इन मतों के आधार पर रावण को दशानन नहीं कहा जा सकता है ।
         कहा जाता है कि महापंडित रावण चार वेद और छः शास्त्र का ज्ञाता होने के कारण दोनों के संयुक्त योगफल दस के प्रतीक स्वरूप दशानन कहलाया । यह भी कहा जाता है कि उस समय रावण के पास ऐसा यंत्र था जो उसे दसों दिशाओं की जानकारी देता था । इस कारण उसे दशानन कहा गया । ' जैन पद्म पुराण ' में महाकवि रविषेणाचार्य ने स्पष्ट लिखा है कि रावण के गले में नौ मणियों युक्त एक कंठ हार था जिसमें उसके नौ प्रतिबिम्ब दिखते थे । इस कारण से रावण को दशानन कहा जाने लगा । यह भी कहा जाता है कि रावण का साम्राज्य दस राज्यों तक फैला था । अतः ये दस राज्य रावण के आनन थे और वह दशानन कहलाया ।
         इन पौराणिक तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि रावण के दस सिर नहीं अपितु एक सिर ही था । रावण की राजसिक श्रद्धा अत्यंत ही प्रबल थी क्योंकि बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त करने के लिए उसने कभी ब्राह्मण को बलि का साधन नहीं बनाया बल्कि अपने उपास्य देव शिव को अपने ही सिरों की आहुति देकर प्रसन्न किया। रावण ने दस बार अपना सिर शिव को अर्पित किया । इस कारण भी रावण दशानन कहलाया ।
         रावण पर राम की विजय की स्मृति में विजय दशमी का पर्व परम्परागत रूप से मनाया जाता है । वर्तमान युग में मनुष्यकामक्रोघमदलोभमोह रुपी पंच विकारों में लिप्त है । अधर्मभ्रष्टाचारसाम्प्रदायिकताअशांति होने के कारण वर्तमान युग को रावण राज्य भी  कहते है । इन सभी विकारों का परित्याग कर राम-राज्य की कल्पना की जा सकती है।


उदयपुर (राज.)फोन : 0294-2482020     मो. 94141 77572

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

प्रत्यक्ष हनुमान : जाखू हिम पर्वतमाला




       ‘‘धरती पर प्रत्यक्ष रूप से अगर पवन-पुत्र हनुमान जी के दर्शन करने हो तो देव भूमि हिमाचल की राजधानी शिमला जरूर जावें’’ यह बात अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातनाम न्यूरो सर्जन जो कि मेरे मित्र हैंडॉनगेन्द्र शर्मा ने कही। तभी से मैंने निश्चय कर लिया कि मुझे देवभूमि जाकर रामभक्त हनुमानजी के दर्शन करने हैं।
     14 जून, 2012 को मैं परिवार सहित शिमला पहुंचा तथा हनुमानजी के दर्शन को आतुर हिम पहाड़ियों के मध्य स्थित मन्दिर में गया। पौराणिक कथाओं के अनुसार तथा वहां लगे शिलालेख के आधार पर यह मन्दिर जाखू पहाड़ी पर स्थित है।
     शिमला शहर से मात्र 2 कि.मीकी दूरी पर घने पहाड़ी तथा देवदार के वृक्षों से घिरी पर्वतमाला जिसे जाखू पहाड़ी कहते हैं। जहां पर यह मन्दिर स्थित है। समुद्रतल से 8500  फीट की ऊँचाई तथा शिमला शहर के ऐतिहासिक रिज मैदान के पूर्व में होने से आसानी से पहुंचा जा सकता है।



     इतिहास - पौराणिक तथा रामायणकाल के पूर्व राम तथा रावण के मध्य लंका विजय के दौरान मेघनाद के तीर से भगवान राम के अनुज लक्ष्मण घायल एवं बेहोश हो गये थे। उस समय सब उपचार निष्फल हो जाने के कारण वैद्यराज ने कहा कि अब एक ही उपचार शेष बचा है। जिसमें हिमालय के पर्वतमाला की संजीवनी जड़ी बूटी है जो इनका जीवन बचा सकती है। इस संकट की घड़ी में रामभक्त हनुमान ने कहा कि प्रभु मैं संजीवनी लेकर आता हूँ। आदेश पाकर हनुमान हिमालय की ओर उड़ेरास्तें में उन्होंने नीचे पहाड़ी पर ‘‘याकू’’ नामक ऋषि को देखा तो वे नीचे पहाड़ी पर उतरे। जिस समय पहाड़ी पर उतरे उस समय इस पहाड़ी ने उनके भार को सहन नहीं किया परिणामस्वरूप पहाड़ी जमीन में धंस गई। मूल पहाड़ी आधी से ज्यादा धरती में समा गई इस पहाड़ी का नाम जाखू है। यह जाखू नाम ऋषि ‘‘याकू’’ के नाम पर पड़ा। श्री हनुमान ने ऋषि को नमन कर संजीवनी बूटी के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की तथा ऋषि से वायदा किया कि संजीवनी लेकर जाते समय ऋषि आश्रम जाखू पहाड़ी पर जरूर आयेंगे परन्तु संजीवनी लेकर वापस जाते समय रास्ते में ‘‘कालनेमी’’ राक्षस द्वारा रास्ता रोकने पर उससे युद्ध कर परास्त किया। इसी दौरान समय ज्यादा व्यतीत हो जाने के कारण सूक्ष्म भाग से लंका पहुंचने का निश्चय कर रवाना हुए जहां श्रीराम उनका इन्तजार कर रहे थे। उसी भागमभाग तथा समयाभाव के कारण श्री हनुमान वापसी यात्रा में ऋषि ‘‘याकू’’ के आश्रम में जा नहीं सके जहां पर ऋषि श्री हनुमान का इन्तजार कर रहे थे। श्री हनुमान ‘‘याकू’’ ऋषि को नाराज नहीं करना चाहते थे इस कारण अचानक प्रकट होकर वस्तुस्थिति बताकर अलोप (गायबहो गये। ऋषि याकू ने श्री हनुमान की याद में वहां मन्दिर निर्माण करवाया। मन्दिर में जहां पर हनुमानजी ने अपने चरण रखे थेउन चरणों को मारबल पत्थर से बनवाकर रखे गये हैं तथा ऋषि ने वरदान दिया कि बन्दरों के देवता हनुमान जब तक यह पहाड़ी है लोगों द्वारा पूजे जावेंगे।
     आज भी हजारों की संख्या में पर्यटक यहां पर आते हैंतथा बन्दरों को मूंगफली तथा केले आदि खिलाते हैंजो प्रेम से खाते हैं। इसी मन्दिर परिसर में गत तीन वर्षों पहले 108 फीट ऊँचे कद की आधुनिक नवीन तकनीकी युक्त हनुमान मूर्ति का निर्माण करवाया गया। इस मूर्ति निर्माण में 1.5 करोड़ की लागत आई तथा यह मूर्ति 1.5 टन वजनी है। मूर्ति निर्माण में सैंसर लगाया गया है जिससे पक्षी आदि मूर्ति पर नहीं बैठे।
     यात्रा का सही समय - मार्च से जून तक का समय अत्यंत ही उपयुक्त है। भारत के प्रत्येक बड़े शहर/राज्य की राजधानी से ‘‘कालका’’ रेल्वे स्टेशन जुड़ा हुआ है। यहां तक आने के बाद यहां से छोटी लाईन से ‘‘खिलौना ट्रेन’’ के माध्यम से शिमला पहुंचा जा सकता है। बस सुविधा भी कालका से उपलब्ध है। सर्दियों में शिमला का तापमान 2 डिग्री से.ग्रेसे 8 डिग्री से.ग्रेतक रहता है। अक्टूबर से फरवरी तक यहां पर बर्फ गिरती है जहां स्नोफॉल एवं स्केटिंग का पर्यटक आनन्द लेते हैं।
     मन्दिर में दर्शन समय - गर्मियों में प्रातः 7 बजे से रात्रि 8 बजे तक तथा सर्दियों में प्रातः 8 बजे से सायं 6 बजे तक दर्शन करने हेतु मंदिर खुला रहता है।



    सावधान - मन्दिर प्रवेश के समय बन्दरों की बहुतायत होती है इसलिए बन्दरों से छेड़-छाड़ नहीं करें तथा बिना छेड़-छाड़ बन्दर किसी को भी हानि नहीं पहुंचाते हैं। बच्चों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।                      


.    दाधीच रामगोपाल शर्मा (जन सम्पर्क अधिकारी,जोधपुर) 


गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

ईर्ष्या ; व्यक्तित्व का लुभावना छिद्र

( जीवन दर्शन )
                                                                                
                                                                                                               - रामकुमार तिवाड़ी, लाडनूं


( है तो यह विडम्बना पर है सच कि अधिकांश व्यक्ति अपने दुःख से दुखी कम व दूसरों के सुख से दुखी ज्यादा होते हैं,. ऐसे परसुख कातर व्यक्तियों एवं उनकी मनोवृति को केन्द्र में रख कर व्यंग्य लेखन प्रस्तुत है श्री रामकुमार जी तिवाड़ी का,जो मूलतः लाडनूं, जिला नागौर, राजस्थान निवासी एवं सेवा निवृत शिक्षक हैं- संपादक )

        

इस शहर में हमारी स्मृतियां जुड़ी हुई है। प्रवेश करते-करते बहुत भला लगा। ऊँची इमारतों को देख कर लगा शहर प्रगति पर है। सम्पन्नता बढ़ रही है। शास्त्री जी के यहां पहुंचते-पहुंचते सारी खुशियां किरकिरी हो गई। पूरा शहर तरक्की करे हमें मंजूर है। परन्तु शास्त्री जी तो हमारे मित्र हैं, उनके दो मकानहमारे चुभन होने लगी। परन्तु करें भी क्या ? कुछ घुमा फिरा आलोचना कर मन को शान्त किया।
        हजारों पुलिस अधिकारी हैं, और भी बनेंगे। गत वर्ष वर्मा जी का पुत्र थानेदार बन गया। यह बुरा हुआ। वर्मा तो हमारा परम मित्र है, उनका पुत्र हमारे पुत्र से अधिक अर्जित करे, यह सहजता से कैसे स्वीकार हो सकता है ? संगठन में अनेक पदाधिकारी है। जबसे मिश्रा जी चमके हैं, और चुने गये हैं, हमारी बारह बज गई है। क्योंकि ये हमारे निकटस्थ हैऔर निकटस्थ की सफलता से हमारी छाती पर सांप लोटना स्वाभाविक ही है। दुनिया सम्पन्न हो जाय, हमें तो आज तक कभी दुःख हुआ ही नहीं, परन्तु हमारी आंखों के सामने हमारा कोई निकटस्थ एवं घनिष्ठ मित्र सम्बन्धी सफल होता है, तो हम ऊपर से तो बहुत प्रशंसा कर देते हैंपर अन्दर की बात तो हर एक को कैसे बतायें कि हमारे खून सूखने का एक कारण यह भी है।
        प्रयोगशाला में एक खुले मुँह का जार देखा तो पूछा - भाई इस जार का मुंह खुला है, अन्दर के जन्तु बाहर निकल जायेंगे। उत्तर था – नहीं, ऐसा नहीं होगा। इस जार में केंकड़े हैं। ज्योंही एक केंकड़ा ऊपर उठने का प्रयास करता है, दूसरा उसकी टांग खींच लेता है।
        अपनी भी यही गति है। हमसे छूटेगी भी नहीं, क्योंकि इसे हम बचपन से पालते आ रहे हैं। हमने पहली बार हमारा परीक्षा परिणाम अखबार में देखा। हमारे रोल नम्बर से पहले हमारी सहपाठी स्वामी के रोल नम्बर दिख गये। हमें तो वहीं सांप सूंघ गया। हम उत्तीर्ण हों या नहीं, परन्तु ये अनुत्तीर्ण हो जाता तो भय नहीं रहता। अपने एक मित्र हैं, पत्र-पत्रिकाओं में बहुत छपते हैंसच पूछो तो हमें कोई बीमारी नहीं है। फिर भी हम दुबले होते जा रहे हैं। लाखों साहित्यकार हैं, और बनेंगे परन्तु जब से हमारा मित्र इस श्रेणी में आया है, हम सूखते जा रहे हैं।
        ये तो कुछ उदाहरण मात्र है। बाकी हम ईर्ष्या में आकंठ डूबे हुए हैं। पक्षी आसमान में बहुत ऊँचाई पर उड़ रहा है, परन्तु उसकी दृष्टि जमीन की गंदगी पर है। जरा आत्म-चिन्तन करें, कहीं हम भी ऐसी ही उड़ान तो नहीं भर रहें हैं। और लगे कि कुछ ऐसा ही है, तो हम किसका भला करने जा रहे हैं ? यह तो व्यक्तित्व का एक लुभावना छिद्र हैजिसके रहते व्यक्तित्व का विकास बालू में से तेल निकालने के समान है। हम एक ऐसे दलदल में फंसे जा रहे हैं, जहां पास में एक सरोवर भी है परन्तु हमें सरोवर के पास जाना पसन्द नहीं। हम चाहते हैं दूसरे लोग भी दलदल में फंसे।
        कैसी विडम्बना है। आवश्यकता दलदल से निकलने की हैउसे सुखाने की है। परन्तु हमारा मन्त्व्य सरोवर को ही सुखाने का है। उसे भी दलदल बनाने का है। हमारा जीवन चेतन है। यहां हर एक को चेतना है। गाड़ीवान का पशु लड़खड़ाता है तो वह कहता है, चेतचेतहम भी लड़खड़ा रहे हैं, पर चेतना नहीं चाहते। आवश्यकता चेतने की है दूसरों के प्रति दुर्भावना उखाड़ फेंकने की है। आइये, अपने आस पास के परिवेश से प्रेम करेंस्नेह लुटायें।
        हम जो वस्तु बांटते हैं। वही हमारे पास आती है। हंसी और प्रेम बांटने वालों को ईश्वर हंसी और प्रेम ही भेजता है। हम सबने दुकाने खोल रखी हैउसी का स्टॉक बढ़ता जाता है। हम जलनईर्ष्याअसन्तोषकुढ़न की दुकान खोल कर अपने लिए प्रेमस्नेहसंतोष का वर प्राप्त करना चाहते हैं। इतना बड़ा झूठ चल नहीं सकता यह हमें लील जायेगा।
        अतः हमें अपनों के लिए स्नेह के फूल खिलाने ही होंगे। इमर्सन ने ठीक कहा था,‘‘जाओ अपने बीवीबच्चों को प्यार करोअपने लकड़हारे से प्यार करो।’’
        सीधा सा, सरल सा मूल्यांकन है। हमें अगर पड़ौस की खुशियां अच्छी लगती है, तो हमारी गाड़ी पटरी पर है। आगे बढ  रही है, और अगर द्वेष है तो हमारी गाड़ी पटरी छोड़ रही है। हमारा पतन तो निश्चित है ही परन्तु एक ऐसी बदबू भी छोड़ जायेंगे, जिसे फैलाने का अधिकार हमें कतई नहीं था।


शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

परमार्थ परम धर्म है

-देवदत्त दाधीच "छोटी खाटू वाले"
                  


जग  में जीवन श्रेष्ठ  वही जो फूलों सा मुस्काता  है
अपने गुण सौरभ से जग के कण-कण को महकाता है।
जग तो एक सराय अनोखी,  सुख-दुख इसमें हैं भरपूर
सुख देने से सुख मिलता हैदुख दे तो दुःख से हो चूर।
ये कुछ पल की जिन्दगी हैजाना सबको  है इक रोज
पल का नहीं  ठिकाना तेरा क्यों करता  बरसों की सोच।



मनुष्य जीवन बड़े भाग्य से मिला है, इसका सदुपयोग करो। 

''बड़े भाग्य मानुस तन पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन्हि गावा।'' 


      चैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि हमने भारत जैसे धार्मिकआध्यात्मिकसांस्कृतिक राष्ट्र में जन्म लिया है और पर उपकार करना हमारे रग-रग में व्याप्त हैअतः जीवन सफल करने के लिए तकलीफजदा व्यक्ति की मदद करकेचाहे वह किसी प्रकार की तकलीफ होयह कार्य करना चाहिए। “भारत भूमि ते मनुज जनम लेसार्थक करना तो कर उपकार। ”  दुःखी व जरूरतमन्द की सेवा से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। ''परहित सरिस धर्म नहीं भाईपर पीड़ा सम नहीं अधमाई। '' रामचरित मानस के उत्तर काण्ड में गोस्वामी जी ने लिखा है - दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुख पहुंचाने के समान कोई पाप (नीचता) नहीं है। हमारे वेदों-पुराणों का भी सार यही है। हमारा देश धार्मिक मान्यताओं वाला देश है। यहां पाप और पुण्य की परिभाषा सभी जानते हैं। दूसरों की भलाई करना पुण्य और कष्ट देना पाप है। महाभारत व पुराणों में भी वेद-व्यास जी ने कहा है - ''अष्टादश  पुराणेशु व्यासस्य वचन द्वयमपरोपकारः पुण्यायपापाय पर-पीड़कम्।'' श्री रविन्द्रनाथ टैगोर ने भी कहा है यदि मनुष्य निरन्तर सुखी रहना चाहता है तो उसे परोपकार के लिए जीवित रहना है। कविवर रहीम जी ने भी कहा है - दूसरों की भलाई करने व सुख पहुंचाने वाले को ठीक उसी प्रकार का लाभ मिलता हैजैसे मेहन्दी बांटने वाले को स्वयं मेहन्दी का रंग लग जाता है - ''जो रहीम सुख होत हैउपकारी के संगबांटण वाले को लगे जो मेहन्दी के रंग '' राजस्थान के लोक साहित्य में भी परमार्थ की शिक्षा दी गई है। ''सरूवरतरूवर संतजन चौथा बरसण मेहपरमारथ के कारणेचारों धारी देह''। अतः दूसरों के कष्ट को दूर करने का निरन्तर प्रयास करना चाहिए। ''तनमनधन कर दीजिये निसिदिन पर उपकारयही सार नर देह मेंवाद-विवाद विसार''। अतः सज्जन लोग सम्पत्ति का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए ही करते हैं। रहीमदास जी ने कहा है ''तरूवर फल नहीं खात हैसरवर पिये न पानकह रहीम परकाज हितसम्पत्ति संचहि सुजान।'' महाकवि माघ ने भी उपकार के लिए लिखा है कि ''सज्जन स्वभाव से ही सदा सभी प्राणियों के उपकार के लिए प्रयत्न करते हैं।'' कबीरदास जी ने कहा है



''तुलसी पंछिन के पीये, घटे ना सरिता नीर।
 दान दिये धन ना घटे जो सहाय रघुवीर।''

      नीति सम्राट आचार्य चाणक्य ने परोपकार करने की शिक्षा दी है - ''परोपकरणं येषां जागर्ति सताम्। नश्यन्ति विपदेस्तेषां सम्पदस्युः पदै पदै।'' जिस मनुष्य के हृदय में परोपकार, भलाई बसी हुई है, वहां विपत्ति आ ही नहीं सकती। वहां तो नित्य समृद्धि ही आती है। सन्त नरसी मेहता ने भी भजन में कहा है - ''वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड़ पराई जाणे रे।'' गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि ''चार वेद षटशास्त्र में बात लिखी है दोय। सुख दीने सुख होत है, दुःख दीने दुःख होय'' महात्मा गांधी ने कहा है कि ''उपकार करने की वृत्ति रखने वाला संसार में कभी दुखी नहीं हो सकता।'' राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी कहा है कि मनुष्य  वही है, जो मनुष्य के लिये मरे।'' दुखी-कष्ट पीड़ित प्राणी-मात्र की सेवा करना और सुख पहुंचाना, ये परोपकार के लक्षण है। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि हे अर्जुन, जैसे  सूखे प्रदेश में वर्षा तथा भूखे को भोजन कराना सार्थक होता है, वैसे ही निर्धन असहाय को दिया गया दान सफल होता है।परोपकार की महिमा के लिए कवि ने कहा है ''औरों के लिए जो जीता है, औरों के लिए जो मरता है। उसका हर आंसू रामायण, उसका हर  कर्म गीता है।'' संसार में उसी व्यक्ति का जीवन सार्थक है, जिसने अपने जीवन में सदैव दीन, दुखी, पीड़ित, बीमार, लाचार, विकलांग व जरूरतमंद की तन-मन-धन से सामर्थ्य के अनुसार सेवा की है।

''परहित बस जिन्ह के मन माहीं, तिन्ह कहुं जग दुर्लभ कछु नां ही।''
शास्त्रों में कहा गया है
विद्या मित्रं प्रवासेषु , भार्या मित्र गृहेषु च, व्याधिनस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च।

      विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी। रोगी की मित्र दवाई और मरने वाले का मित्र उसका धर्म अर्थात् जीवन में किए गए शुभ कार्य (उपकार) होते हैं।
      एक कवि ने ईश्वर को इंगित करते हुए कहा - ''भगवान, मैं तुझे मंदिरों, मस्जिदो और गिरजाघरों में ढूंढता फिरता था। लेकिन तू तो गरीब के झोंपड़े और किसान के खेत में बैठा था। वास्तव में गरीब, दुखी व जरूरतमन्द लोगों की सेवा करने से हम पर ईश्वरीय कृपा होती है। इस सम्बन्ध में स्वामी रामतीर्थ का उदाहरण प्रस्तुत है। जब वे लाहौर के कॉलेज में गणित के प्रोफेसर थे। उस समय जब उनको अपने पूरे महीने की तनखा मिली तो उन्होंने सारा पैसा कॉलेज के गरीब बच्चों के खान-पान, उनकी फीस पर खर्च कर दिया। ईश्वर की ऐसी कृपा हुई कि वे तीर्थराम से स्वामी रामतीर्थ बन गये और विदेशों में उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्रवचन करके भारत का नाम रोशन किया।

जीवनं  स्वयं  प्रदायोपकारणेयो, जीव यत्याशु  चान्यानालं भूतले।
नैव मृत्यु भर्वेतस्य मान्यो बुद्येः,देह मृत्युं न मृत्युं वदनत्यागमाः।।

      पृथ्वी पर जो अपना जीवन देकर उपकार से दूसरों को जीवित रखता / रखती है, उसकी मृत्यु कभी नहीं होती। बुद्धिमानों में वह सम्मानित होता है। क्योंकि शास्त्रों में तो देह की मृत्यु को मृत्यु नहीं कहा है। श्रेष्ठ है, जिससे परोपकार हेतु बार-बार मानव जन्म मिले और यह लोक कल्याणकारी पुण्य करने का अवसर मिले।
             देहदान इस नश्वर शरीर का पवित्र एवं दिव्य उद्देश्य है। इस से जीने का आनन्द एवं तृप्ति का भाव कई गुना बढ़ जाता है। अतः निर्विवाद रूप से देने का भाव, देना और दान सतभाव व सत्कर्म है। नेत्रदान, रक्तदान, अंगदान एवं देहदान दिव्य एवं दैवीय कर्म है। महर्षि दधीचि जैसे लोकहितार्थ त्याग का हमें अनुसरण करके इस कार्य में तुरन्त जुट जाना चाहिए। परोपकार न करने वाले मनुष्य का जीवन धिक्कार है, क्योंकि उनसे तो वह चार पैर वाला पशु भी श्रेष्ठ व उपकारी है जिसका मरणोपरांत चमड़ा भी पर उपकार में प्रयुक्त होता है।
1431 चाणक्य मार्ग, सुभाष चौक, जयपु



गुरुवार, 16 अगस्त 2012

ओ बादलियो बरस्यो कोनी


 राजस्थानी कविता 

 प्रेषक-गौरी शंकर शर्मा 
(ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था पूर्णतः वर्षा आधारित है। पर जब वर्षा अर्थात बादल दगा दे जाए तब गांव की, विशेषतः कृषक महिलाओं की क्या स्थिति होती है, का करुण चित्र इस कविता में खींचा गया है। इस वर्ष मानसून के आने में विलम्ब से ‘‘जल ही जीवन है’’ ,को हमने बड़ी शिद्दत से समझा महसूस किया। पर इस से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होने वाले वाले गांवों पर क्या प्रभाव पडता है, का जीवंत वर्णन ताल छापर तहसील सुजानगढ़  जिला चुरू राजस्थान निवासी कवि स्वर्गीय छगनमल शर्मा ने किया है, जो सुजलांचल के राजस्थानी भाषा के ख्यात नाम यशस्वी कवि रहे हैं। प्रस्तुत कविता उनके ही पुत्र सहित्य्कार एवम कवि, श्री गौरी शंकर शर्मा ने प्रेषित की है- संपादक)

मैं बाबल रे घर चिड्कोली
सासू  रे  आगे  लाड़ बहु
दो  रोटी खातर बिलखू हूँ
ओ दुखड़ो किण ने जाय कहूँ

जद मजदूरण मन मार उठी
हालर ने दीन्यो परो फेंक
ली मेल तगारी माथे पर
रोई बादल ने देख देख

ओ धणी धजालो जाणे है
मैं खारा मीठा चाखू हूँ
ओ बदलियो बरस्यो कोनी
मैं जण जण रो मुह ताकूँ हूँ


ओ धेनड़ियो जद जलाम्यो हो
कर कोड भुवा जी आया हां
ल्याया हां छूछक नानाजी
घर भर म हरख सवाया हां

पण आज चुंगा नी पाऊँ मैं
परबस हूँ बोल सकूँ कोनी
ए मेट साब अफसर करडा
मूंडो भी खोल सकूँ कोनी

  रोवंतड़े  लाडेसर  ने
भूखो ही धरत्या न्हाकूं हूँ
ओ बादलियो बरस्यो कोनी
मैं जण जण रो मुह ताकूँ हूँ


म्हे  खेत  खाटबा जाता जद
मारुजी सार  घणी करता
बे  छाक  उतारण बेगा  सा
हल  छोड़ सामने पग धरता

पण आज खोद आली माटी
दे  टोक  ऊंचावे  है  कूंडो
अपणायत  सारी  भूल गया
  पापी  पेट  घणू भून्डो

दिन भर चकरी ज्यूँ भाज भाज
पग  दूखे  भारी  थाकूं हूँ
ओ बादलियो बरस्यो कोनी
मैं जण जण रो मुह ताकूँ हूँ


दिन उगता पेली टाबरिया
रोटी  रे  खातर  गरलावे
सांची सुण भूखा मरता ही
खाली आँतड़ियाँ कुरलावे

आफत ही आफत चोफेरां
हे राम कठीने जाऊं मैं
रुपिया रो धोबो धान मिले
किण रे लिलाड़ लगाऊँ मैं

जाणे ह जिवड़ो म्हाकालो
नीठा  पुचकारूं  राखूं  हूँ
ओ बादलियो बरस्यो कोनी
मैं जण जण रो मुह ताकूँ हूँ


दिन बीस हुआ पचताने पण
कुण् जाणे कद खुलसी थेल्याँ
के खाकर दिन भर काम करां
के पेट रे अब  गाँठा   देल्याँ

हाटां  पर  मिले  उधार  नहीं
जे  मिल्ज्या  तो  दूणा लागे
पटवारी   बात  सुण   कोनी
के करां ? पुकारां  किन आगे

आ फंसगी ज्यान झमेला म
मैं नहीं लूण  की फाकूं हूँ
ओ बादालियो बरस्यो कोनी
जण जण रो मुह ताकूँ हूँ


पण आज सुणी है गावां में
साईं धान मिलेला अब सस्ता
भीजी रो ज्ञान पकड़ ल्यां  तो
ओज्युं ही रे ज्यावां बसता

फिरतो सांवारियो बरसा दे
खेता म भेली फोज हुआँ
धोरां पर बाजर लहरावे
फिर तो म्हे राजा भोज हुआँ

आ साची साची बात कही
कूड़ी बिलकुल नहीं भान्कूं हूँ
ओ बादालियो बरस्यो कोनी
मैं जण जण रो मुह ताकूँ हूँ



महान पौराणिक महिलाएं : प्रचलित बनाम वास्तविक नाम

 - देवदत्त शर्मा  

 (यह शोध परक लेख श्री देवदत्त शर्मा , अजमेर ने भेजा हैजो मूलतः रेवेन्यू बोर्ड अजमेर में एडवोकेट हैं। वकालत के नीरस पेशे का साहित्य रसास्वादन एवं सृजनअध्यवसाय से दूर दूर का वास्ता नहीं होता किन्तु व्यक्ति के भीतर रस का सोता कहीं सोता हो तो अवसर पाते ही फूट पड़ता है। आशा है श्री शर्माजी का यह सर्वथा मौलिक लेख आपको नवीन जानकारियों से रू-ब-रू कराएगा -संपादक ) 

           भारतीय संस्कृति मातृशक्ति की संस्कृति रही है। समाज में पुरुषों के साथ महिलाओं को सदा सम्मानजनक स्थान मिला है। पौराणिक गाथाओं में विख्यात महिलाओं के प्रसंग हैजो आज सर्वत्र वन्दनीय है। जन मानस में प्रत्येक की वाणी पर इनके नाम अमर है। परन्तु आश्चर्य इस बात का है कि जिन नामों से ये नारियाँ विख्यात हैवे इनके वास्तविक नाम नहीं है। कुछ के वास्तविक नामों का उल्लेख हैपरन्तु उनका प्रचलन ही नहीं है। नाम का यह रहस्य विशेषणों एवं राजनीतिक प्रभाव को ही दर्शाता है। तथापि इन नारियों ने अपनी प्रतिभा के बल पर ख्याति प्राप्त की है। ऐसी ही कुछ वन्दनीय महिलाओं के नामों का उल्लेख करना उचित होगाजिनसे भारतीय संस्कृति एवं समाज सदा प्रभावित रहे हैं। ये हैं-  

देवी पार्वती
 (1) पार्वती- भगवान शिव की पत्नी शक्ति स्वरूपा एवं देवी माँ के रूप में पूजनीय है। ‘पार्वती’ नाम से विख्यात संज्ञा वस्तुतः कुल परंपरागत नाम है। पर्वतराज (हिमवान) की पुत्री होने के कारण इन्हें पार्वती नाम से जाना जाता है। पार्वती का वास्तविक नाम तो ‘शिवा’ है। किन्तु इनके  शिवा’ नाम से जन मानस अनभिज्ञ है। 



माता कौशल्या 
 (2) कौशल्या- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की माता का यह नाम वास्तविक नहीं है। वस्तुतः कौशल राज्य की राजकुमारी होने के कारण इन्हें ‘कौशल्या’ के नाम से जाना जाने लगा। इनके वास्तविक नाम का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। 



माता सुमित्रा 
 (3) सुमित्रा- अयोध्या नरेश दशरथ की दूसरी पत्नी का नाम सुमित्रा भी उनके पिता के सन्दर्भ में है|इनके पिता का नाम सुमित था अतः इन्हें लोक में सुमित्रा के नाम से जाना जाता है। 


माता कैकेयी
 (4) कैकेयी - महाराज दशरथ की तृतीय महत्वाकांक्षी पत्नी कैकेयी को मैं सर्वाधिक वन्दनीय मानता हूँ। कैकेयी का सम्पूर्ण जीवन लोकरक्षक का रहा है। कैकेय नरेश की पुत्री होने के कारण अयोध्या में इन्हें कैकेयी के नाम से जाना जाता है। इनके वास्तविक नाम का कहीं कोई जिक्र नहीं हैं। यह महिला रघुकुल की प्रतिष्ठित,राम,दशरथ एवं सम्पूर्ण रघुकुल की हितैषी रही है। कठोर निर्णय लेने के कारण लोक में इनकी आलोचना हुयी। 



माता शबरी
 (5) ‘शबरी’- भी वास्तविक नाम नहीं है। वस्तुतः शबर नामक आदिवासी जाति के नाम से इस महिला को ‘शबरी’ के नाम से जाना गया। आदिवासी जाति भील का सुसंस्कृत नाम शबर है। 



माता गांधारी
 (6) गांधारी- महाभारत की विख्यात महिलाधृतराष्ट्र की पत्नी तथा दुर्योधन की माता गंधार प्रदेश की राजकुमारी थीइसलिए कुरु कुल में यह गांधारी के नाम से जानी गयी। इनके भी वास्तविक नाम का कहीं कोई जिक्र नहीं है। 




सूर्य का आव्हान करती राजकुमारी कुंती 
 (7) कुंती- पांडवों की माता का वास्तविक नाम ‘पृथा’ था। यह कृष्ण के पिता वासुदेव की बहन थी। पृथा के पिता शूरसेन ने अपने निस्संतान मित्र ‘कुन्तिभोज’ को पृथा गोद दी थीअतः कुन्तिभोज के नाम पर पृथा को कुंती के नाम से जाना गया। इनका आज भी इनका विख्यात एवं प्रचलित नाम कुंती ही है। 



पांडू की मृत्यु पर विलापरत माद्री 
 (8) माद्री- पांडवों की दूसरी माता ‘मद्रदेश’ की राजकुमारी थीअतः उन्हें ‘माद्री’ के नाम से जाना जाता है। इनका भी वास्तविक नाम अज्ञात है। 





द्रौपदी
 (9) द्रौपदी- अपने समय की सताई हुयी किन्तु स्वभाव से क्षमाशील नारी द्रौपदी को यह नाम अपने पिता द्रुपुद के कारण मिला। आज भी यह लोक में यह इसी नाम से विख्यात है। वस्तुतः अग्निकुंड से उत्पन्न इस महिला का वर्ण श्याम रंग (कृष्ण वर्ण) थाअतः इसका नाम  कृष्णा रखा गया। महा भारत में इस नाम का उल्लेख हैकिन्तु इस नाम से यह महिला अल्पज्ञात है। 



माता सीता 
 (10) वैदेही- मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की पत्नी ‘सीता’ जनमानस में आदर्शतम एवं सर्वपूज्य महिला है। हल से भूमि जोतने के दौरान भूमि पर बनी लकीर को सीता कहा जाता है। इस महिला के जन्म की यही कहानी है। जनक राज्य की पुत्री होने के कारण जानकी तथा अपने पिता विदेह के नाम पर ‘वैदेही’ नाम से प्रसिद्द है। 
  इसी प्रकार और भी विख्यात महिलायें भारतीय संस्कृति में हुई हैजिनके नाम का रहस्य उजागर नहीं है. सभी की ख्याति और उनका व्यक्तित्व तत्कालीन राजनीति और अन्य आधारों पर प्रचलित है।                   
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...