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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

कविता का जन्म !



[ सहज नहीं है काव्य सृजन,सहज है तो आलोचना ! काव्य सृजन की क्या परिस्थिति होती हैक्या कवि की मनस्थिति होती है कैसे होता है काव्य सृजन, से आप सुधि पाठकों को रू--रू कराने को प्रस्तुत है यह कविता - बी  जी शर्मा ]

कविता का जन्म


मन मे भरी हो विरह वेदनाया प्रिय से मिलने का उल्लास !
घोर निराशा का अन्धियाराया आशा उत्साह का हो प्रकाश !!


अन्तस् मे उबल रहा आक्रोशया पीड़ा से  भीगा  हो   मन !
कल्पना का अम्बार लगा होछोटा पड़ रहा मन का आँगन  !


ज्वालामुखी फट  पडने को होमन मे भट्टी  भावों  की तपती है !
कवि की कलम से फूटे  झरनातब कही एक गजल बनती है !!


शब्दों का नहीं भीड़ भड़क्कासार्थक शब्दों की पांत सजा दी !
भाषा है रथ  विषय है दूल्हाऔर भावों की  बारात  सजा दी !!


काव्य रसों की मेहंदी रचा करकविता  दुल्हन  बन  बैठी  है !
उपमा के गहनों से सजधज पाठक  के   मन  में   पैठी  है !!


कल्पनाओं के इन्द्रधनुष परविचारों की प्रत्यन्चा  तनती  है  !
सुधि  श्रोताओं का मन हरनेतब कविता या गजल बनती है !!


भूख प्यास नहीं नींद उचट गयी जाने क्यूँ मन है व्याकुल !
अजन्मी कविता बदले करवटइसीलिए कविवर है आकुल !!


भाव स्निग्ध पर शब्द मिलेमिले शब्द तो विषय अस्पष्ट !
अपूर्ण कविता कैसे पूर्ण  होकविवर का बस एक ही कष्ट !!


कोख  कमल में नौ महीने रखजैसे माँ बच्चा जनती है !
कवि  जब भुगते प्रसव वेदना, तब कहीं एक गजल बनती है





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